मंगलवार, 19 मार्च 2013

यह देश बड़ा रंगीला है

यह देश बड़ा रंगीला है 

यह देश बड़ा रंगीला है।

यहाँ कदम कदम रंगबाज खड़े 

रंगदारी टैक्स वसूल रहे।
नेता रंगरलियों में डूबे 
कर्तव्य स्वयं का भूल रहे।

आकंठ फंसे घोटालों में 
है फिर भी शर्म नहीं कोई।
वे धर्म सिखाते औरों को 
पर अपना धर्म नहीं कोई।

वे वाहुबली कुछ भी कर लें 

रिश्वत खाएँ जेबें भर लें।
चोरों को जेल नहीं होती 
शासन कुछ ऐसा ढीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।


हैं रंग रंग की पोशाकें 
औ रंग रंग के झंडे हैं।
हैं गर्मागर्म योजनाएं 
रखने को बस्ते ठण्डे हैं।

वोटों के लिए करें कुछ भी 

वे जाति धर्म की बात करें।
चाहे कोई भी चलें चाल 
चाहे जैसी भी घात करें।

दंगों की आग लगा कर के 

वे सेक रहे अपनी रोटी।
वे गिद्ध सियारों से बढकर 
नोंचें जन की बोटी बोटी।

क्या कहिये एक एक पार्टी को 
गुंडों का एक कबीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।

सब डूबे हैं अपने रंग में 

सरक़ार और नौकरशाही।
सब राहें जाती संसद तक 
वह मंजिल, सब उसके राही।

है अर्थ बना भगवान यहाँ 
वह शब्द ब्रह्म की बात झूठ।
मौसेरे भाई चोर सभी 
सच कह दो तो सब जाएँ रूठ।

कान्हा का रास वहीँ अब तो 

आए दिन होते नंग नाच।
गीता रामायण वेद त्याग 
सब कामसूत्र हैं रहे बांच।

मैं नित नित गीत सुनाता हूँ 
एक ही बात दुहराता हूँ।
ये चले जा रहे जिस पथ पर 
वह पंथ बड़ा रपटीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।

बढ़ रहे भेड़िये रँगे हुए 

केसरिया लाल और धानी।
अंगडाए फिरते शेरों से 
भर गयी इन्हीं से राजधानी।

जिस तिस पर करते आँख लाल 

दिखलाते सपने बड़े बड़े।
नीचे चलते रंगीन पेय 
ऊपर गांधी चुपचाप खड़े।

हैं मंच बने ऊँचे ऊँचे 
जनता बेचारी नीची है।
दे देकर भडकाऊ भाषण 
सीमा रेखाएं खींची हैं।

भीतर में घुप्प अन्धेरा है 

बाहर सबकुछ चमकीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।

- डा . कुंवर वीर सिंह मार्तंड 







शुक्रवार, 15 मार्च 2013

वसंत गीत

वसंत गीत 

चली वसंत बयार 
महक उठी मन की फुलबगिया। 


पत्र पत्र खिलते ख्वावों के 
पुष्प पुष्प कोमल भावों के 
भंवर करें गुंजार 
महक उठी मन की फुलबगिया। 


शब्द शब्द पायल की रुनझुन 
चरण चरण गीतों की सरगम 
कोयल करे पुकार 
महक उठी मन की फुलबगिया। 

वर्ण कली से शब्द फूल बन 
अलंकार रस छंद धूल बन 
करें भाव संचार 
महक उठी मन की फुलबगिया। 

छंद बने स्वछन्द महकते 
ज्यों नभ में खग वृन्द चहकते 
बने वाद्य के तार 
महक उठी मन की फुलबगिया।। 



शनिवार, 9 मार्च 2013

लघु पत्र पत्रिका मेला 2 0 1 3 

पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ष एक अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला तो होता ही है, इसके अलावा हर अंचल में अलग अलग पुस्तक मेले होते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में लघु पत्र पत्रिका मेले भी होते है। ऐसा ही एक मेला  २ ४ परगना के बज बज क्षेत्र में 8 मार्च 2 0 1 3  को आयोजित हुआ। प्रस्तुत है इसका एक वीडियो ---


सोमवार, 4 मार्च 2013

स्मृतियाँ


नावक के तीर एवं साहित्य त्रिवेणी के दो अंकों के लोकार्पण के मौके पर 


भारत मित्र  के संपादक  श्री इसराइल अंसारी वक्तव्य रखते हुए 


साहित्य त्रिवेणी के नशामुक्ति विशेषांक का लोकार्पण करते हुए  कवि शायर अगम शर्मा, पत्रिका के संपादक कुंवर वीर सिंह मार्तंड , भारत मित्र के संपादक इसराइल अंसारी , प्रभात वार्ता के संपादक राज मिठौलिया , बंगला कवि प्रवीर चटर्जी  एवं शायर हलिम शाविर 


" नावक के  तीर " का लोकार्पण करते हुए  कवि शायर अगम शर्मा, पत्रिका के संपादक कुंवर वीर सिंह मार्तंड , भारत मित्र के संपादक इसराइल अंसारी , प्रभात वार्ता के संपादक राज मिठौलिया , बंगला कवि प्रवीर चटर्जी  एवं शायर हलिम शाविर 


काव्य पाठ करते हुए कवि लखवीर सिंह निर्दोष 


कविता पाठ करते हुए बांग्ला कवि प्रवीर चटर्जी 
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कोटा, राजस्थान में 


एक वृद्धाश्रम में हिंदी की दशा और दिशा विषय पर वक्तव्य रखने के  बाद रामू भैया एवं श्याम लाल उपाध्याय एवं अन्य के साथ  कवि मार्तण्ड 


अन्य कवियों के मध्य में गुलावी शर्ट पहने कवि मार्तण्ड , माइक पर कवयित्री रूचि चतुर्वेदी  


कवि सम्मेलन मंच पर 


कवयित्री रूचि चतुर्वेदी काव्य पाठ करते हुए  


मार्तण्ड दर्शक दीर्घा में दूसरी पंक्ति के मध्य में 
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फ़िरोज़ाबाद में 


राम सनेही लाल शर्मा यायावर पर केन्द्रित साहित्य त्रिवेणी के विशेषांक के लोकार्पण के अवसर पर वक्तव्य रखते हुए श्री जितेन्द्र जौहर जी 


बाएँ से प्रथम कवि मार्तंड द्वितीय जितेन्द्र जौहर और सबसे दाएं दिवाकर  वर्मा 


यायावर जी के आवास पर 


यायावर जी के आवास पर 


यायावर जी के आवास पर 
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