यह देश बड़ा रंगीला है
यह देश बड़ा रंगीला है।
यहाँ कदम कदम रंगबाज खड़े
रंगदारी टैक्स वसूल रहे।
नेता रंगरलियों में डूबे
कर्तव्य स्वयं का भूल रहे।
आकंठ फंसे घोटालों में
है फिर भी शर्म नहीं कोई।
वे धर्म सिखाते औरों को
पर अपना धर्म नहीं कोई।
वे वाहुबली कुछ भी कर लें
रिश्वत खाएँ जेबें भर लें।
चोरों को जेल नहीं होती
शासन कुछ ऐसा ढीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
हैं रंग रंग की पोशाकें
औ रंग रंग के झंडे हैं।
हैं गर्मागर्म योजनाएं
रखने को बस्ते ठण्डे हैं।
वोटों के लिए करें कुछ भी
वे जाति धर्म की बात करें।
चाहे कोई भी चलें चाल
चाहे जैसी भी घात करें।
दंगों की आग लगा कर के
वे सेक रहे अपनी रोटी।
वे गिद्ध सियारों से बढकर
नोंचें जन की बोटी बोटी।
क्या कहिये एक एक पार्टी को
गुंडों का एक कबीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
सब डूबे हैं अपने रंग में
सरक़ार और नौकरशाही।
सब राहें जाती संसद तक
वह मंजिल, सब उसके राही।
है अर्थ बना भगवान यहाँ
वह शब्द ब्रह्म की बात झूठ।
मौसेरे भाई चोर सभी
सच कह दो तो सब जाएँ रूठ।
कान्हा का रास वहीँ अब तो
आए दिन होते नंग नाच।
गीता रामायण वेद त्याग
सब कामसूत्र हैं रहे बांच।
मैं नित नित गीत सुनाता हूँ
एक ही बात दुहराता हूँ।
ये चले जा रहे जिस पथ पर
वह पंथ बड़ा रपटीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
बढ़ रहे भेड़िये रँगे हुए
केसरिया लाल और धानी।
अंगडाए फिरते शेरों से
भर गयी इन्हीं से राजधानी।
जिस तिस पर करते आँख लाल
दिखलाते सपने बड़े बड़े।
नीचे चलते रंगीन पेय
ऊपर गांधी चुपचाप खड़े।
हैं मंच बने ऊँचे ऊँचे
जनता बेचारी नीची है।
दे देकर भडकाऊ भाषण
सीमा रेखाएं खींची हैं।
भीतर में घुप्प अन्धेरा है
बाहर सबकुछ चमकीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
- डा . कुंवर वीर सिंह मार्तंड
यह देश बड़ा रंगीला है।
यहाँ कदम कदम रंगबाज खड़े
रंगदारी टैक्स वसूल रहे।
नेता रंगरलियों में डूबे
कर्तव्य स्वयं का भूल रहे।
आकंठ फंसे घोटालों में
है फिर भी शर्म नहीं कोई।
वे धर्म सिखाते औरों को
पर अपना धर्म नहीं कोई।
वे वाहुबली कुछ भी कर लें
रिश्वत खाएँ जेबें भर लें।
चोरों को जेल नहीं होती
शासन कुछ ऐसा ढीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
हैं रंग रंग की पोशाकें
औ रंग रंग के झंडे हैं।
हैं गर्मागर्म योजनाएं
रखने को बस्ते ठण्डे हैं।
वोटों के लिए करें कुछ भी
वे जाति धर्म की बात करें।
चाहे कोई भी चलें चाल
चाहे जैसी भी घात करें।
दंगों की आग लगा कर के
वे सेक रहे अपनी रोटी।
वे गिद्ध सियारों से बढकर
नोंचें जन की बोटी बोटी।
क्या कहिये एक एक पार्टी को
गुंडों का एक कबीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
सब डूबे हैं अपने रंग में
सरक़ार और नौकरशाही।
सब राहें जाती संसद तक
वह मंजिल, सब उसके राही।
है अर्थ बना भगवान यहाँ
वह शब्द ब्रह्म की बात झूठ।
मौसेरे भाई चोर सभी
सच कह दो तो सब जाएँ रूठ।
कान्हा का रास वहीँ अब तो
आए दिन होते नंग नाच।
गीता रामायण वेद त्याग
सब कामसूत्र हैं रहे बांच।
मैं नित नित गीत सुनाता हूँ
एक ही बात दुहराता हूँ।
ये चले जा रहे जिस पथ पर
वह पंथ बड़ा रपटीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
बढ़ रहे भेड़िये रँगे हुए
केसरिया लाल और धानी।
अंगडाए फिरते शेरों से
भर गयी इन्हीं से राजधानी।
जिस तिस पर करते आँख लाल
दिखलाते सपने बड़े बड़े।
नीचे चलते रंगीन पेय
ऊपर गांधी चुपचाप खड़े।
हैं मंच बने ऊँचे ऊँचे
जनता बेचारी नीची है।
दे देकर भडकाऊ भाषण
सीमा रेखाएं खींची हैं।
भीतर में घुप्प अन्धेरा है
बाहर सबकुछ चमकीला है।
यह देश बड़ा रंगीला है।
- डा . कुंवर वीर सिंह मार्तंड
























परियाबा में सम्मान ग्रहण करते हुए मार्तंड 