गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

matri bhasha diwas

मातृभाषा दिवस 

आज २ १ फ़रवरी है यानि अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस। मातृभाषा यानि वह भाषा जिसे सर्वप्रथम माँ के मुंह सुनते व सीखते है। जिसका सम्बन्ध हमारी आत्मा से है। मातृभाषा हमें जान से भी अधिक प्यारी होती है। हम चाहे कहीं भी चले जाये पर इसे नहीं भूल पाते। इसके सम्मान हेतु हम प्राणों की भी परवाह नहीं करते। इसका एक ज्वलंत उदाहरण है बांग्लादेश (पहले का पुरबी पाकिस्तान). भारत विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान दो भाग मिले - पश्चिमी पाकिस्तान व पूर्वी पाकिस्तान।

दोनों पकिस्तानो की राजधानी प. पाकिस्तान में थी। वहां की सरकार ने हुकुम दिया कि दोनों देशो की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी। यह फरमान पूर्वी पाकिस्तान को अच्छा नहीं लगा। वहां के लोग बंगला भाषा को ही राष्ट्र भाषा बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। अंत में १९५२ में २ १ फ़रवरी के दिन कई लोगों की जाने गई। इसके बाद संघर्ष में और तेजी आ गई। १ ९ ७ १ में बंगला देश स्वतंत्र भी हो गया। वहां की राष्ट्र भाषा बंगला बनी। अंत में १ ९ ९ ४ में यूनेस्को ने २ १ फ़रवरी को अंतर राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। 
२ १ फ़रवरी के वलिदानो की याद में एक स्मृति स्तम्भ बनाया गया। 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

ayo rituraj

आयो ऋतुराज 














आयो ऋतुराज 

दोहा - 
महकि महकि महुआ झरें, चहकि खग गाय।
लहक़ि लहकि लहके धरा बहकि बहकि मन जाय ।

गीत -

फूल हँसे कली खिली भौर गुनगुनाये
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

फलियाँ छमकें बलियाँ महकें, खेलि रहीं रंगरलियाँ 

कलियन ऊपर उड़ें तितलियाँ, भरि फूलनि की डलियाँ गलियाँ, 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

लाल हरे पीरे खेतन में मानो फाग मनायो 

अथवा काहू चतुर चितेरे चिन चिन चौक वनायो भायो 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

मनजरियन को मुकुट बान्धि के झुकी आम की डाली

मधुपन के संग फागुन गावे कोयलिया मतवाली काली 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

गैहूँ चना मटर सरसों ने ओढि वसन्ती  साडी 

हर हराइ के अरहर बोली में न रहूंगी क्वारी वारी 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

पेड़न में नव किसलय फूटे रूठो साजन आयो 

दामिनिया सी कामिनिया ने नाचो शोर मचायो गायो 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

गली-गली में ढोलक बाजी भरि उमंग में टोली 

होली गावे रोली फैके खेले आँख मिचोली भोली 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

उड़त गुलाल लाल भए अम्बर रंगी रँगीली चोली 

अंटा  गोली खेले मेलें रंगोली हमजोली बोली 
आयो ऋतुराज पतवा झरें।

- कुं . वीर सिंह मार्तण्ड , संपादक - साहित्य त्रिवेणी 



Mere Kavi Mitra


सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

vividha


सरस्वती पूजा, ..... प . बंगाल 
कालिदास जिस डाल  पर बैठे है उसी को काटते हुए 
आगे चलकर वे सरस्वती की कृपा से ही विद्वान बने।



मार्तंड आगरा में हुए 13 वे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मान में भाग लेते हुए 


13वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मलेन में सम्मान ग्रहण करते हुए मार्तंड 


13 वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मलेन में 
श्री राम चन्द्र कृपालु भजु मन ... पर नृत्य करते हुए एक विद्यालय के बच्चे 



मार्तंड अखिलेश निगम के साथ परियाबा में 


मार्तंड केवल कृष्ण पाठक के साथ 


मार्तंड शरद नारायण खरे के साथ 


हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग में वक्तव्य रखते हुए 


मार्तंड अखिल भारतीय कविसम्मेलन में कविता पाठ करते हुए 


मार्तंड तुमसर में दिनेश देहाती के साथ 


martand ke vividh roop


मार्तंड अशोक चक्रधर एवं राज कुमार रंजन के साथ 


मार्तंड शिव सागर शर्मा के साथ 


हितेश कुमार शर्मा एवं वृन्दावन त्रिपाठी रत्नेश के साथ 


श्री नाथद्वारा में भगवती प्रसाद देवपुरा से सम्मान ग्रहण करते हुए 


श्री नाथद्वारा में संपादक रत्न सम्मान ग्रहण करते हुए 

18 वें अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन में मंच पर मध्य में  , दिल्ली 


14 वें अखिल भारतीय हिंदी साहित्य समारोह में मंच पर , दिल्ली 


राज कुमार रंजन एवं रामजी लाल सुमन के साथ , आगरा 

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

bhartendu jayanti in kota

राजस्थान के कोटा में भारतेन्दु  जयन्ती,  के अवसर बाएं 
से दूसरे डा . कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड 

kuchh khas

आनंद सुमन सिंह कोलकाता में
बाएँ से कृष्ण कुमार यादव, कुंवर वीर सिंह मार्तंड, आनंद सुमन सिंह  



कुँवर वीर सिंह मार्तंड अपनी धर्म पत्नी एवं साहित्य त्रिवेणी स्वत्याधिकरिणी श्रीमती मधु सिंह के साथ 


कुंवर  वीर सिंह मार्तंड कोलकाता में बहुभाषी कविसम्मेलन
 का संचालन करते हुए 


कुंवर  वीर सिंह मार्तंड आगरा के कवि रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी के साथ 



 साहित्य त्रिवेणी के कुछ अंक 





pariyaba evam bhakti dham men

















    देश के कोने कोने से आए हुए साहित्यकार



 वक्तव्य रखते हुए भगवान प्रसाद  वक्तव्य रखते हुए श्यामलाल उपाध्याय 
















kota ki yaden





मार्तण्ड कोटा में मयूख जी व 
आ . भगवत दुबे के साथ 




मार्तंड जी भारतेंदु महोत्सव में 
सम्मान ग्रहण करते हुए 





                                                 




सम्मानित  साहित्यकारों  
के साथ सबसे दाएं 




भारतेंदु उत्सव के एक दिन 
पूर्व कविसम्मेलन में 









मयूख जी द्वारा बनवाया गया 
मयूखेश्वर महादेव-मंदिर