ज्ञान की देवी सरस्वती पूजा सम्पन्न हुई। यह पर्व प्रति वर्ष माघ शुक्ल पंचमी के दिन मनाया जाता है। इसी दिन महाप्राण निराला का जन्म दिन पड़ता है। निराला जी का जन्म पश्चिम बंगाल महिषादल में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा बंगला माध्यम से ही हुई। हिंदी उन्होंने बाद में सीखी। और जैसा कि आप जानते हैं आगे चलकर वे हिंदी के महान कवि बने।
पश्चिम बंगाल में सरस्वती पूजा बड़ी धूम धाम से मनाई जाती है। स्कूल कालेजों में तो यह अनिवार्य रूप से होती ही है सार्वजनिक रूप से हर गली मुहल्ले में भी इसकी धूम रहती है। इस मौके पर विविध प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
कवि होने के नाते मेरी प्रार्थना यह है -
हे मराल वाहिनी हौं मांगों ऐसो वरदान
मेरी बुद्धि में तू निज पुस्तक को धारि दे।
मेरे सोये भाव को जगादे आज वीणा पाणी
वीणा की आवाज मेरी वाणी में उतारि दे।
हेरी हंसवाहिनी तू हंस की सवारी छोडि
मेरे मन-मंदिर में आसन को धारि दे।
ज्ञान ज्योति की किरण विश्व में विखेरिवे को
मेरी कल्पना को निज हंस पै बिठारी दे।
मेरी मातु शारदे हों तेरे रहिवे के काज
मैले मन-मंदिर को चाव सों संवारतो।
शब्दनि के मोती कल्पना के थाल में सजाय
हंस को चुगाय गाय आरती उतारतों।
तेरे वंदन के हेतु चन्दन को चोकु पूरि
हेरी मेरी मातु तोहि आजु हों मनावतो।
दुष्ट नीच पापी शत्रु काहू के न आगे झुको
ऐसो शीश मातु तेरे सामने झुकावतों।
मेरे गीत सुनि हिल जायं बेरिन दिल
मातु मोको ऐसो गीतकार तू वनाइ दे।
सर सों हू सर कटे तो हु शत्रु करों सर
मातु मोकों ऐसो सरदार तू बनाइ दे।
बिंदी-बिंदी बम और मात्रा - मात्रा तीर बने
पत्र -पत्र कों तो पेनी धार तू बनाइ दे
शीश काटिवे को छाटिवे को दुष्टनि के दल
मेरी लेखनी को पतवार तू वनाइ दे।
पश्चिम बंगाल में सरस्वती पूजा बड़ी धूम धाम से मनाई जाती है। स्कूल कालेजों में तो यह अनिवार्य रूप से होती ही है सार्वजनिक रूप से हर गली मुहल्ले में भी इसकी धूम रहती है। इस मौके पर विविध प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
कवि होने के नाते मेरी प्रार्थना यह है -
हे मराल वाहिनी हौं मांगों ऐसो वरदान
मेरी बुद्धि में तू निज पुस्तक को धारि दे।
मेरे सोये भाव को जगादे आज वीणा पाणी
वीणा की आवाज मेरी वाणी में उतारि दे।
हेरी हंसवाहिनी तू हंस की सवारी छोडि
मेरे मन-मंदिर में आसन को धारि दे।
ज्ञान ज्योति की किरण विश्व में विखेरिवे को
मेरी कल्पना को निज हंस पै बिठारी दे।
मेरी मातु शारदे हों तेरे रहिवे के काज
मैले मन-मंदिर को चाव सों संवारतो।
शब्दनि के मोती कल्पना के थाल में सजाय
हंस को चुगाय गाय आरती उतारतों।
तेरे वंदन के हेतु चन्दन को चोकु पूरि
हेरी मेरी मातु तोहि आजु हों मनावतो।
दुष्ट नीच पापी शत्रु काहू के न आगे झुको
ऐसो शीश मातु तेरे सामने झुकावतों।
मेरे गीत सुनि हिल जायं बेरिन दिल
मातु मोको ऐसो गीतकार तू वनाइ दे।
सर सों हू सर कटे तो हु शत्रु करों सर
मातु मोकों ऐसो सरदार तू बनाइ दे।
बिंदी-बिंदी बम और मात्रा - मात्रा तीर बने
पत्र -पत्र कों तो पेनी धार तू बनाइ दे
शीश काटिवे को छाटिवे को दुष्टनि के दल
मेरी लेखनी को पतवार तू वनाइ दे।
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